Where’s the Pride in our Freedom? – Rishi Raj Vyas

 

In contemporary India, although we have come across a long journey of acknowledgement of rights and one’s dignity, yet the LGBTQIA community lacks such basic rights because we’ve been both socially and legally oppressed since the satanic colonial era. Today we demand freedom of expression of who we are; we don’t want be criminals any more. Therefore, to give a shoutout to my people and all those queer kids who are still in the closet due to fear of oppression, I’ve written this piece.

पहनो जो तुम पहनना चाहते हो
करो जो तुम्हारा दिल कहे
ज़माने की बंदिशों को परवरदिगार ना समझ,
अनासिर बुत ना समझ मुझे
मैं भी उतना ही खुदा हु जितना है तू
घुंगरू तो मुझसे पूछते नहीं “आखिर तेरी ज़ात क्या है?”

ना जाने किसने देख ली क्रूरता में मर्दानगी
क्या कभी देखा हमें रोते हुए?

ना जाने कौन कहता है की लड़के सजते नहीं, सवरते नहीं?
ना जाने कौन कहता है जबतक वो कमाएं ना तबतक वो कुल का चिराग होते नहीं?

ना जाने कितनी आरज़ुएँ निस्तेनाबूत ना हुई
ना जाने कितने सितारे आसमान तलक टूटे नहीं

कौन कहता है औरत तो महज़ कांच की गुड़िया है
वह नगरवधू भी उतनी ही दुर्गा है जितनी है काली तू
कोके में ना मारो उन्हें कम से कम हयात की उड़ान तो भरने दो
अर्धनारीश्वर की छववी को सांस तो लेने दो

मेरे ख़याल ही हैं कुछ यूँ
क्या इसलिए उसने मुझे नहीं स्वीकारा?
या फिर इसलिए ना स्वीकारा
क्योंकि मैं विचित्र हूँ?
खुदा की ये परछाई तो देखो
वो कोरा कागज़
और मैं, सतरंगी सा चित्र हूँ

 

Image Credit : Aryaman Trivedi

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